आराधना और पूजा पद्धति
संकलन -
श्री माधव चंद्र चौधरी
श्री अवधेश चौधरी
*ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।*
तदनुसार आश्विन मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को दुर्गापूजा प्रारंभ होता है। मोतिया ग्राम स्थित 20 खुट के कुल पुरुष कुंजमान चौधरी की पीढ़ी के निजी दुर्गामंडप में विधि विधान के साथ पूजा संचालन विगत 200 वर्षों से परिवार के पीढ़ी दर पीढ़ी द्वारा किया जा रहा है।
मणि पत्रिका त्रिपुर सुंदरी महामाया का दुर्गामंडप में सात-आठ पुरोहितों के द्वारा पूजा सम्पन्न कराया जाता है। पुरोहित श्री अशोक मिश्र के नेतृत्व में श्री अनिरुद्ध मिश्र, श्री त्रिपुरारी मिश्र, हीरालाल मिश्र, मोहन मिश्र, प्रमोद मिश्र एवं अन्य पुरोहितों के द्वारा पूजा की प्रक्रिया शुरू की जाती है।
पूजा के एक दिन पूर्व महालया के रोज प्रधान पंडित, पुजेरी एवं परिवार के भक्तजन गंगा स्नान से शुद्धि करके गंगाजल सहित मंडप में विराजमान होते हैं। प्रथम पूजा शैलपुत्री के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले माँ के सिरा को चावल पीस कर ‘अरपाइना’ बनाया जाता है, और माँ के सिरों में पोता जाता है। ऊपरी दिशा में त्रिशुल कि संख्या-21 होती है, और नीचे त्रिशुल की संख्या-24 । सम्पूर्ण सिरा को सुहागन महिला द्वारा सिंदूर कि बिंदी सम्पूर्ण सिरा में लगाई जाती है। उसके बाद कलश स्थापना की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इसके बाद पुरोहितों द्वारा परिवार के 174 (वर्तमान में ) सदस्यों के नाम संकल्प होता है। संकल्प 1 से 10 दिन की पूजा के प्रारंभ में प्रत्येक दिन होता है।
1 से 10 पूजा तक चौमुखी दीपक अनवरत जलते रहता है। महिलाएँ दुर्गा सप्तशती का पाठ विभिन्न पुरोहितों से अनुष्ठान करती हैं। मुख्य पंडितों द्वारा यजमान को सम्पूर्ण चंडीपाठ सुनाकर समाप्त की जाती है। पूजा समाप्ति के बाद मंडप के प्रांगण में भोजन के रूप में दही, चूड़ा, गुड़, अंकुरा हुआ चना, मूंग इत्यादि का सेवन करते हैं और रात्रि में जिस परिवार की पारी रहती , वहीं सभी पुरोहित भोजन किया करते थे ।पिछले दो तीन वर्षों से पंडितों के आवासन और भोजन की व्यवस्था पूजा समिति द्वारा कराए जाने की परम्परा प्रारंभ हुई है।
यह क्रम पहली पूजा से विजय दशमी तक चलता है। पूजा समाप्ति के बाद मंदिर प्रांगण में उपस्थित सभी भक्तजनों के बीच प्रसाद का वितरण किया जाता है। पिछले तीन वर्षों से पूजा समिति द्वारा अष्टमी,नवमी और दशमी पूजा के दिन बाईस खूट परिवार के घर घर प्रसाद(दो टिकरी, दो पुआ) पहुंचवाया जाता है। दशमी के दिन मोतिया गांव के सभी ब्राह्मण परिवार के घर भी प्रसाद पहुंचवाया जाता है।
प्रथम पूजा से लेकर 5वीं पूजा तक एक समान पूजा पद्धति अपनाया जाता है। द्वितीय पूजा ब्रह्मचारिणी के रूप में, तृतीय पूजा चन्द्र घंटा के रूप में चतुर्थ पूजा कुसमाण्डा के रूप में तथा पंचम पूजा स्कन्दमाता के रूप में की जाती है।
षष्ठी पूजा माँ कात्यायनी के रूप में होती है। पूजा माँ के स्वरूप के अनुसार मंत्रोच्चारण के साथ पुजारी द्वारा शुरू किया जाता है। सबसे पहले संकल्प से प्रारंभ होता है। अखण्ड दीप प्रज्जलित रहता है ।सभी पुरोहितगण दुर्गा चंडीपाठ का शुभारंभ करते हैं। उसके बाद उसी दिन बेलभरना पूजा की प्रक्रिया शुरू होती है। इस पूजा में सभी भक्तजन, पुरोहित, यजमान गाजे-बाजे के साथ बेल वृक्ष को आमंत्रित करने पहुँचते हैं। यहाँ पर दुर्गा माँ के गण, वाहन एवं योगिनी को भी माँ के दरबार में सप्तमी के रोज आने का आमंत्रण दिया जाता है। इसी परिपेक्ष्य में जोड़ा बेल(फल) वृक्ष से तोड़ा जाता है तथा सप्तमी के दिन जोड़ा बेल का उपयोग माँ का मूर्तिरूप देने के क्रम में वक्षस्थल के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसे ही बेलभरना पूजा कहते हैं। पूजा विसर्जन के बाद अन्य दिनों की भाँति प्रसाद वितरण किया जाता है।
सप्तमी पूजा कालरात्रि के रूप में मनाया जाता है। पूजा का संचालन मुख्य पुरोहित द्वारा शुरू होता है।अखण्ड दीप प्रज्जलित रहता है। परिवार के मुख्य सदस्यों का संकल्प आदि की प्रक्रिया के उपरान्त चंडीपाठ शुरू होता है। सैकड़ों महिलाएँ पाठ का अनुष्ठान करती हैं। इस अवसर पर परिवार के सदस्य एवं अन्य ग्रामीण नये वस्त्र धारण कर हजारों की संख्या में पूजा में सम्मिलित होते हैं। पूजा में पारंपरिक वाद्य यंत्रों, ढोल, घड़ीघंट आदि का सर्वाधिक प्रयोग होता है। सभी भक्तजन मंत्रोच्चारण में उपस्थित होकर गंगाजल माँ के चरणों में अर्पित करते हैं। इस कार्य को करने में दो-तीन घंटा का समय लगता है। इसके बाद कैलाशम को भक्तजन मंडप के अंदर श्रद्धापूर्वक मंदिर में प्रवेश कराते हैं । कैलाशम को माँ के रूप में सजाते हैं। माँ को साड़ी, गहना, चुनरी, फूल-माला एवं श्रृंगार प्रसाधन से अलंकृत कर विधिवत माँ की पूजा प्रारंभ होती है। माँ के पैर के नीचे आरतपत्ता में कलाई एवं अलता का मिश्रण डालकर रखा जाता है। पकवान बनाने में भी सावधानी रखनी पड़ती है। 9 की संख्या में देहोरी, और 11 की संख्या में पुआ सिर्फ दूध डालकर पकवान बनाया जाता है। जो माँ को प्रत्येक दिन भोग लगता है। शेष पकवान पानी मिश्रित दूध से बनता है । सभी पकवान शुद्ध घी में तैयार किया जाता है। पूर्व में पकवान बनाने का कार्य सत्यनारायण चौधरी की माँ, कैलाश चौधरी की माँ, फकीर चौधरी की माँ, जयनन्दन झा की पत्नी, महेश चौधरी (उत्तर टोला), कमलकांत झा (पूरब टोला) पूरब टोला के बेबी की पत्नी करती थी। पिछले वर्ष से बाईस खूट परिवार की ही महिलाएं पकवान बनाने का काम खुद करती है।
भक्तजनों द्वारा करीब 300 पीस साड़ी, चुनरी, माला इत्यादि माँ के चरणों में अर्पित किया जाता है। सबसे कीमती एक साड़ी पहनाकर शेष को बांध कर गठ्ठर के रूप में माँ के बगल में रख दिया जाता है।
पूजा प्रारंभ होते ही भक्तजनों के आने-जाने का क्रम मंदिर की शोभा को सदा सर्वदा बढ़ाते रहता है। मंदिर के प्रांगण के बगल में मिठाई एवं फलों की दुकान सजती है। मंडप के अगल बगल का क्षेत्र मेला स्थान का स्वरूप ले लेता है। पूजा समाप्ति के उपरांत 4 खूट से पाठा की बलि दी जाती है। यह बलि माँ के गणवाहन एवं योगिनी को प्रदान की जाती है। माता स्वयं वैष्णवी है। बलि मलकाट के माध्यम से नरेश यादव के द्वारा काटा जाता है। यह भी ध्यान रखा जाता है, कि पाठा एक ही बार में कट जाय। एक बार में नहीं कटने पर दो पाठा के बलि देने का प्रावधान है। पूजा समाप्ति के उपरांत 56 भोग महाप्रसाद के रूप में भक्तजनों के बीच वितरित करने की प्रथा जारी है।
अष्टमी पूजा महागौरी के रूप में होता है। इस दिन भक्तों की अपार भीड़ रहती है। पुरुष स्वयं चंडी पाठ करते हैं। महिलाएँ चंडी पाठ का अनुष्ठान करती हैं। अष्टमी की सामान्य पूजा समाप्ति के बाद तीन खुट के द्वारा बलि प्रदान की जाती है। संध्या 5 बजे से सभी महिलाएँ अष्टमी का उपवास करके डलिया लेकर मंदिर में माँ के चरणों में रखती हैं। डलिया सजाने के बाद पुरुष, महिलाएँ, बच्चे-बच्चियाँ उत्तर टोला स्थित बड़ी माँ भगवती का दर्शन करने जाते हैं। इसके अलावा जयनारायण झा एवं डॉ0 तारा शंकर झा के भगवती का भी दर्शन करते हैं। रात्रि भर जागरण की स्थिति बनी रहती है। करीब 12 बजे रात्रि में निशा पूजा प्रारंभ होता है । बलि प्रदान की प्रक्रिया शुरू होती है। निशा बल पाठा का रंग काला होने की बाध्यता अष्टमी पूजा के रोज रहती है। अष्टमी को वर्तमान में करीब 70-75 की संख्या में बलि प्रदान की जाती है। माँ के सामने पाठा के मुण्डी को खप्पड़ में रखकर दीप प्रज्वलित किया जाता है।
ज्ञातव्य हो कि कभी-कभी अष्टमी निशा पूजा सप्तमी पूजा के साथ भी होता है। कभी-कभी अष्टमी और नवमी की पूजा एक ही दिन होती है। पूजा समाप्ति के बाद महाप्रसाद का वितरण होता है। इस तरह अष्टमी पूजा की समाप्ति होती है।
नवमी पूजा माँ सिद्धिदात्री के रूप में शुरू होती है। मंदिर की सफाई के उपरांत सभी भक्तजन पाठ पढ़ने एवं श्रवण करने में अपनी तल्लीनता दिखाते हैं। इस दौरान विभिन्न मीडिया संगठन के पत्रकार माँ के परिसर में आकर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की जानकारी लेते हैं। यह सिलसिला दिन भर चलते रहता है। इस दिन संध्या 5 बजे से पाठा का संकल्प शुरू होता है। सबसे पहले सरकारी पाठा का संकल्प होता है। पुनः पाँच खुट, आठ खुट, चार खुट एवं तीन खुट का संकल्प होता है बाद में भैगनमान परिवार का ।इसके बाद ग्रामीण एवं बाहरी लोगों का संकल्प होता है। इस दिन संकल्प क्रिया में तीन घंटे से अधिक समय लगता है । बलि प्रदान करते-करते तीन-चार (ब्रह्म मुहर्त) बजे सुबह हो जाता है। वर्तमान में बलि की संख्या चार-पाँच सौ के लगभग होती है। नवमी की बलि में पाठा के रंग की बाध्यता नहीं रहती है। नवमी के पूजोपरांत बच्चे के मुण्डन का कार्य शुरू होता है। होम समाप्ति के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। होम का टीका (तिलक) लगाने की परम्परा है। बलि देने वाले किसी भी भक्तजनों से संकल्प शुल्क नहीं लिया जाता है।
दशमी पूजा महाविद्या के रूप में समापन की प्रक्रिया होती है। इस दिन सुबह सिरा वितरण के बाद मंदिर की सफाई एवं पूजा अर्चना का कार्य प्रारंभ होता है। वर्तमान में दिन में खीर का भोग एवं बारह तरह के अनाज से बना हुआ भूजा का प्रसाद बनाया जाता है। माँ के विसर्जन की शुरुआत होती है। इसमें करीब 1/2 किलोमीटर पर स्थित मधेया तालाब तक हजारों की संख्या में पुरुष, महिला, बच्चे जयकारा करते हुए एवं महिलाएँ शोहर, शुभमंगल भगवती गीत को गाते हुए तालाब तक जाती हैं। इसमें सिर्फ भारतीय वाद्य यंत्र का इस्तेमाल होता है । विसर्जन के क्रम में प्रथम बड़ी दुर्गा का विसर्जन होता है पुनः छोटी भगवती माँ को जल में विसर्जित किया जाता है। वहाँ से लौटने के बाद मंदिर प्रांगण में सभी लोग एकत्रित होते हैं और दुर्गा पूजा के परिपेक्ष्य में तथा गाँव के विकास सम्बन्धी बातों पर गहन-चिन्तन मनन करते है। बाद में तीन खूट के वरिष्ठ सदस्य अवधेश चौधरी को पगड़ी बांधने का रस्म पूरा किया जाता है। सभी के माथे पर जयती रखा जाता है। पुनः खीर एवं भूजा का प्रसाद भक्तजनों के बीच बाँटकर पूजा की समाप्ति माना जाता है। सभी भक्तजन भगवती माँ को कोटि-कोटि प्रणाम कर अपने घर की ओर प्रस्थान करते हैं।
विजया दशमी के उपरांत मंडप प्रांगण में “सीता-राम” संकीर्तन के धुन के साथ अष्टयाम होता है। अष्टयाम समाप्ति के बाद ब्राह्मण भोजन कराने की परम्परा अनवरत जारी है ।
।। जय मां भगवती त्रिपुर सुंदरी ।।
माँ की यात्रा और कृपा
संकलन -
श्री माधव चंद्र चौधरी
श्री अवधेश चौधरी
आज से लगभग 200 वर्षों पूर्व कुंजोमान जी के समय सीमित परिवार था।तो सीमित दायरे में पूजा अर्चना छोटे से घर में सम्पन्न हो जाया करता था । पुरोहित आज के मुख्य पुरोहित अशोक मिश्रा के पूर्वज सुरत लाल मिश्रा तथा उनके अमतर वंशज द्वारा कराया जाता था।
दुर्गा पूजा के संचालन हेतु कालांतर में भगवती के नाम तीन खूँट के वंशजों द्वारा (बटन लाल चौधरी पेसर-वंशी लाल चौधरी) 7 बीघा जमीन सुपुर्द किया।उस जमीन की उपज से पूजा का खर्च वहन हुआ करता था। धीरे धीरे उपज से प्राप्त होने वाली राशि की निरंतरता एक समान नहीं रहने लगी।वर्तमान में उस सात बीघे जमीन के उपज से सिर्फ संबंधित खूट(तीन खूट)अपनी श्रद्धा से सहयोग राशि उपलब्ध कराते है।
पूजा का पुजारी का काम वंशज के बड़े भाई होने के नाते नन्दलाल चौधरी, वंशी लाल चौधरी एवं अन्य लोगों ने निर्वाहन किया। पूजा के उपरांत बड़े भाई के सम्मान के रूप में पगड़ी बंधन के(ताज पोशी) रस्म का निर्वहन अब भी किया जा रहा है ।
पूर्व मेंबड़े वंशज के नाते तीन खूट परिवार के घर पर ही पूजा अर्चना का कार्य सम्पन्न होता था।
वर्षों बाद पूजा स्थान जाधव चौधरी के घर से पशुपति चौधरी के मकान में स्थापित किया गया। कई वर्षों तक पशुपति चौधरी के घर पर माँ भगवती की पूजा सम्पन्न होती रही।
उत्पन्न विशेष परिस्थितियों के कारण पशुपति चौधरी के घर से मां भगवती को दूसरे स्थान पर स्थापित करने की पहल हुई।
इसी दरम्यान 1956 ई० में रामेश्वर चौधरी के पुत्र उमेश चौधरी का द्विरागमन हुआ था। दुल्हिन के आने पर बलि देने की प्रथा मंडप में थी। रामेश्वर चौधरी अपने नव पुत्र वधु के साथ पशुपति चौधरी के घर मंडप पर बलि देना चाहे लेकिन पशुपति चौधरी के परिवार ने मंडप में बलि देने से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में रामेश्वर चौधरी ने राधा दीदी पति-तापेश्वर झा कि परती जमीन (आज का दुर्गा मंडप) पर बलि प्रदान कर दिया।
कालांतर में उसी जगह रामेश्वर चौधरी द्वारा दुर्गा मंडप निर्माण का नेतृत्व किया गया। रामेश्वर चौधरी सहित 22 खूँट परिवार के अन्य सदस्यों के आर्थिक सहयोग से मंडप का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ।
वर्तमान स्थान पर 1956 ई० से दुर्गा पूजा यही बने मंडप में धूम-धाम से मनाया जाता है।
वर्तमान भगवती मंडप में माँ के विसर्जन के बाद परम्परागत पगड़ी बंधन का कार्य सबसे पहले जाधव चौधरी के पुत्र उमेश चौधरी को ताज पोशी कर के सम्पन्न कराया गया। 28 मार्च 1957 ई० को उमेश चौधरी का आकस्मिक निधन हो गया। 1957 ई० से 2020 तक राजकिशोर चौधरी के सिर पगड़ी बंधन का रस्म (64 वर्षों तक) किया जाता रहा। राजकिशोर चौधरी की मृत्यु के बाद 2021 ई० से अवधेश चौधरी को पगड़ी बांधने को रस्म पूरा किया जाता है।
वर्षों से आज तक अपने परिवार के सदस्यों की दुर्गा पूजा में सराहनीय योगदान रहा है। काफी वर्ष पूर्व मार्कण्डेय चौधरी पुजेरी हुआ करते थे।देवन चौधरी भंडारी बनते थे तथा सहायता के लिए नकुल चौधरी उर्फ नवको काका का भूमिका होती थी। सहायक के रूप में त्रिवेणी चौधरी तत्पर रहते थे। मंदिर के पूजा प्रबंधन में हुवलाल चौधरी, शक्तिनाथ चौधरी, मुनीलाल चौधरी, घृतनाथ चौधरी, मोतीलाल चौधरी, मुरारी चौधरी, सत्यनारायण चौधरी तथा अन्य लोगों की अहम भूमिका रहती थी। उस समय लगभग 40-45 पाटा का बलि पड़ता था।
प्रारंभिक दिनों में पाठा काटने का काम मोतीलाल चौधरी द्वारा किया जाता था । मलकाठ में पाठा डालने तथा पकड़ने का काम चुनचुन राउत एवं जागेश्वर झा करते थे। कालांतर में पाठा काटने का काम जागेश्वर झा, जयनन्दन झा, हल्लो चौधरी (उत्तर टोला) द्वारा किया गया।वर्तमान में नरेश यादव द्वारा किया जा रहा है।
पहले इस कार्य में सूर्य नारायण चौधरी, व्यास देव चौधरी, त्रिवेणी चौधरी, फकीर चौधरी, पशुपति चौधरी, सत्यनारायण चौधरी, वैद्यनाथ चौधरी, कमलाकान्त चौधरी, राजकिशोर चौधरी, महेशकांत चौधरी, गणेश कांत चौधरी, शशिकांत चौधरी तथा अन्य लोगों का सराहनीय योगदान रहा ।
माँ की असीम अनुकम्पा एवं आशीर्वाद से परिवार के लोग फल-फूल एवं समृद्धशाली हो रहे हैं। इसका जीता जागता उदाहरण - रामेश्वर चौधरी इस इलाके के धनाढ्य व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हुए। परिवार के दीपनारायण चौधरी बिहार विधान सभा के सदस्य एवं एम० एल० सी० भी रहे । वे सफल अधिवक्ता एवं बिहार विधान सभा के पीठासीन अध्यक्ष भी रहे। व्यक्तिगत सफलता के अलावा श्री दीपनारायण चौधरी, जनार्दन चौधरी, सूर्य नारायण चौधरी, भुवनेश्वर झा, इत्यादि का योगदान स्वतंत्रता संग्राम में भी अविस्मरणीय रहा । उपरोक्त विभूतियों को जेल की यातना के साथ-साथ अंग्रेजों द्वारा सैकड़ों बेंत से पिटाई कि सजा हुई थी। ये सभी क्रांतिकारी 22 खूँट परिवार से ही आते हैं। इसके आगे की पीढ़ी पर एक नजर डालें तो देखते हैं कि हरि प्रसाद चौधरी मोतिया गाँव के प्रथम इंजिनियर एवं ज्योतिष चौधरी अपने जमाने के तेज तर्रार इंजिनियर के पद पर विभिन्न तकनीकी संस्थानों में कार्यरत रहे हैं। इनके समकालीन पिताम्बर चौधरी पे०-भुवनेश्वर चौधरी ने भी ख्याति प्राप्त इंजिनियर के रूप में विभिन्न तकनीकी संस्थानों में कार्य किये हैं।
आगे की पीढ़ी में सुशील चौधरी गोड्डा जिला के प्रथम आई० ए० एस० के रूप में चयनित हुए। उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए उन्होंने झारखण्ड सरकार में मुख्य सचिव के पद तक पहुंचे । इनकी पत्नी श्रीमती कुमुद चौधरी आई० पी० एस० , झारखण्ड सरकार में पुलिस महानिदेशक के पद तक पहुँचने का गौरव प्राप्त किया है। इसी कड़ी में विधान चन्द्र चौधरी जिला न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण कर चुके हैं। परिवार के एक अन्य विभूति श्री हिमांशु शेखर चौधरी तात्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के राजनीतिक सलाहकार रहे।वो सूचना आयुक्त फिर कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त रहे । वो झारखंड राज्य खाद्य आयोग के अध्यक्ष भी रहे।
श्री प्राणधन चौधरी शिक्षक को राष्ट्रीय पुरस्कार 1992 ई० में पंडित शंकर दयाल शर्मा, राष्ट्रपति भारत सरकार द्वारा प्रदत्त किया गया।
2007 ई० में माधव चंद्र चौधरी जो प्राणधन चौधरी के छोटे भाई है इन्हें भी राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा शिक्षक राष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में नवाजा गया है।
परिवार के ही सदस्यों में से श्री भवानन्द चौधरी एक वरिष्ठ इंजिनियर के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न तकनीकी संस्थानों में कार्य करने के बाद करीब 40 फैक्ट्री का स्वतः निर्माण कराया। इनके सौजन्य से सैकड़ों बेरोजगार युवकों को नौकरी मिली है। जो समाज के लिए एक मिसाल है। तत्काल में श्री चौधरी कन्सलटेंट (परामर्शदाता) के रूप में विभिन्न संस्थानों पर कार्यरत हैं। 1970 की मैट्रिक की परीक्षा में बिहार बोर्ड से रंजन कुमार चौधरी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उनकी सफलता आज भी बिहार के बुद्ध मार्ग स्थित कार्यालय में शीलापट पर उद्धृत है। मेडिकल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद इन्होंने कर्नल पद पर अपना पदस्थापन दिया। ये और इनके तीनों भाई नेतरहाट विद्यालय के छात्र रहे हैं। डा० रंजन चौधरी अवकाश प्राप्त करने के बाद भी विभिन्न संस्थानों के निदेशक एवं नर्सिंग संस्थान के निदेशक के रूप में कार्यरत है।
22 खूँट परिवार में अनेकों डॉक्टर, इंजिनियर, प्रोफेसर, ऑफिसर, अधिवक्ता, बैंक कर्मी एवं शिक्षकों का पदस्थापन हुआ है। परिवार के अनेक लोग विदेश सेवा में भी कार्यरत हैं। पीढ़ी के पूर्वार्द्ध में एक हस्ती पंडित कलाधर चौधरी भी रहे थे। जिन्होंने बनारस से संस्कृत की पढ़ाई की जिन्होंने वेद, पुरान, महाभारत, रामायण, इत्यादि ग्रंथों में महारत हासिल किया था। कभी-कभी पंडितों के साथ शास्त्रार्थ में भी उतर जाते थे। पिता का विरासत पुत्र शुभंकर चौधरी में आया, जिन्हें रामायण और महाभारत में महारत प्राप्त हुआ। इसी कड़ी में एक नाम पंडित मुरारी चौधरी का भी आता है ।जिन्होंने परिवार और समाज में विद्या का अलख जगाया। 1948 से 1950 के बीच उच्च विद्यालय मोतिया की स्थापना हुई । ये सचिव के पद पर आसीन रहे। इतना ही नहीं करीब 30 वर्षों तक ग्राम पंचायत मोतिया के मुखिया पद को भी सुशोभित किया। इनके ही समकालीन महावीर चौधरी मोतिया पंचायत के 30 वर्षों तक सरपंच के पद पर विराजमान रहे।
आज परिवार के अनेकों सदस्य हैं जिन्हें परिवार एवं समाज के पूर्वजों की एवं “कामदा भगवती” की असीम कृपा रही है। आज कुंजोमान चौधरी के तीन पुत्र से हम हजार की संख्या में पहुँच गये हैं। तथा आने वाले पीढ़ी पर भी माँ की अनुकम्पा बनी रहेगी, यह अपेक्षा है।