स्वर्गीय प्राणधन चौधरी
समाज में आ रहे बिखराव के बीच हमारे बाईस खूट परिवार की एक जुटाता पूरे समाज के लिए न सिर्फ अनुकरणीय है बल्कि ये प्रेरणा दायक भी है। हमारे पूर्वजों की दूरदर्शी सोच और अग्रजों की सोच के प्रति संपूर्ण समर्पण के कारण पूरे इलाके ही नहीं, पूरे राज्य और पूरे देश के लिए बाईस खूट परिवार एक मिशाल के रूप में स्थापित हो रहा है।
जड़ से जुड़ाव और मां भगवती के प्रति आस्था के अटूट बंधन के कारण सदियों से परिवार जुड़ा हुआ है। बाईस खूट परिवार की है धूरी, माँ भगवती त्रिपुर सुंदरी।
विकास और समृद्धि एक निरंतर प्रक्रिया है। हमारे पूर्वजों ने मां भगवती त्रिपुरी सुंदरी को अपने परिवार में स्थापित कर अपना कुल देवी माना। पूर्वजों की सोच का ही परिणाम है कि बाईस खूट परिवार में गुरु दीक्षा लेने की परम्परा नहीं रही है। बाईस खूट परिवार में मां भगवती त्रिपुर सुंदरी न सिर्फ कुल देवी है बल्कि वो हमारी गुरु भी हैं।
सदियों पहले शुरू हुई परम्पराओं की पद्धति, प्रक्रिया और मान्यताओं की जानकारी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती रही है। इसका कोई लिखित दस्तावेज रखने की परम्परा पहले नहीं थी। मुझे भी वही जानकारी है जो मेरी माता जी स्वर्गीय सावित्री देवी ने मुझे बताया। मान्यता, परंपरा और सरोकार को मानने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, ये विशुद्ध रूप से आस्था और विश्वास पर टिका होता है। बाईस खूट परिवार की आस्था और विश्वास का ही परिणाम है मोतिया के बाईस खूट परिवार का भगवती मंडप। भगवती मंडप की यात्रा का विवरण दूसरे आलेख में उपलब्ध है। भगवती मंडप आज अलौकिक सौंदर्य का बोध कराता है। माँ के दरबार की भव्यता न सिर्फ परिवार की सम्पन्नता का बोध करता है बल्कि मां भगवती के प्रति संपूर्ण समर्पण, आस्था की पराकाष्ठा दर्शाता है।
अपने पैतृक गांव मोतिया से मेरा जुड़ाव किशोरावस्था में जरूर हुआ लेकिन तब सिर्फ पथिक स्वरूप आता और चला जाता था। मेरे पिता जी स्वर्गीय प्राणधन चौधरी साहिबगंज जिले में सरकारी कर्मी थे। साहिबगंज में हम लोग रहा करते थे। यदा-कदा मोतिया आते थे। पारिवारिक एवं अन्य कारणों से दुर्गा पूजा में भी हर वर्ष नियमित रूप से नहीं आ पाता था।
वर्ष 1993 में पिताजी स्वर्गीय प्राणधन चौधरी सेवानिवृत हुए फिर मोतिया को ही अपना स्थायी निवास बना लिया। पिताजी के मोतिया प्रवास प्रारम्भ होने के बाद मोतिया नियमित रूप से आने का क्रम प्रारंभ हुआ। पिताजी का अपने गांव से लगाव और शहर की सुविधाओं की जगह गांव का परिवेश और माहौल उन्हें ज्यादा भाता था। गांव के प्रति पिताजी के समर्पण को देख मेरे मन में भी पैतृक गांव के प्रति झुकाव और लगाव बढ़ता चला गया। पिताजी की इच्छा के सम्मान और अपने अंतः मन की आवाज के कारण मैने भी अपनी शादी मोतिया से ही करने का निर्णय बहुत पहले लिया था, जो पूरा हुआ। इस बात का उल्लेख प्रसंगहीन नहीं है बल्कि ये बताने का प्रयास है कि पैतृक गांव मोतिया से मेरा लगाव अनायास नहीं हुआ। पिता स्वर्गीय प्राणधन चौधरी और नाना स्वर्गीय रुद्र नारायण झा मेरे जीवन के आदर्श रहे हैं। धर्म के प्रति आडंबर और दिखावा नहीं बल्कि विशुद्ध समर्पण की प्रेरणा मुझे नाना से मिली। सादगी और जड़ से जुड़ाव के प्रेरणा के स्रोत स्वर्गीय पिता जी रहे।
माता जी धर्म और मां भगवती के बारे में बताती थीं। पिताजी सदैव अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सचेत और समर्पित रहने को प्रेरित करते थे।
स्वर्गीय माता-पिता से प्राप्त संस्कार और परम्परा ज्ञान से मां भगवती और पैतृक गांव के प्रति समर्पण बढ़ता चला गया। अपनी माटी की महक ने खींचा और मोतिया में सक्रियता बढ़ती चली गई।
माता-पिता के निधन के बाद प्रत्यक्ष जिम्मेवारी का भाव जगने के बाद मां भगवती के प्रति समर्पण बढ़ता चला गया। प्रयास रहता कि हर वर्ष दुर्गा पूजा में गांव जरूर आए। ये क्रम चलता रहा। इसी दौरान मैंने देखा कि हर वर्ष परिवार के प्रतिनिधि के तौर पर पूजेरी स्नेहमय शांडिल्य ही होते हैं। जबकि परम्परा रही है कि हर वर्ष परिवार के अलग-अलग खूट के पूजेरी होंगे। मैंने स्नेहमय से उसके हर वर्ष पूजेरी बनने की वजह पूछा तो उसने बताया कि भैया क्या करे, परिवार का कोई सदस्य तैयार नहीं होता है। इसलिए पूजेरी बनना पड़ता है। ये सुन मैं व्यथित हो उठा।
मैंने उसी वक्त संकल्प लिया कि मैं पूजेरी बनूँगा। मैंने पुजेरी बनने के निर्णय से जब अपनी पत्नी को अवगत कराया तो उनका कहना था इतनी कठिन साधना आप कर पाएंगे? क्योंकि आपको सुविधायुक्त जीवन जीने की आदत हो चुकी है। मैंने उन्हें कहा माँ भगवती ने मुझे प्रेरित किया है, माँ ही शक्ति देगी। वर्ष 2023 में मैं पूजेरी बना। माँ की आराधना की शक्ति माँ ने ही दी। मेरे पुजेरी बनने के निर्णय के पीछे की असली वजह थी नई पीढ़ी को प्रेरित करना। ये बताना कि यदि दृढ़ संकल्प होगा तो मां भगवती ही आराधना और साधना की शक्ति देगी।
वर्ष 2023 में पूजेरी बनने के कारण भगवती मंडप की परम्परा को नजदीक से जाना और समझा। भगवती मंडप के संचालन और सुविधा में और अधिक बढ़ोतरी करने की आवश्यकता का एहसास हुआ। इस एहसास के बाद मैंने भगवती मंडप के संचालन, व्यवस्था और इसके सौंदर्य को नई ऊंचाई प्रदान करने की प्रक्रिया के श्री गणेश का निर्णय लिया।
मेरी सबसे अधिक पीड़ा थी भगवती मंडप में दुर्गा पूजा के दौरान दस दिनों तक मां की आराधना के लिए मोतिया में प्रवास करने वाले पंडितों को मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। मुझे ये लगा कि हम बाईस खूट परिवार सम्पन्न है। मां की आराधना के लिए दस दिन तक प्रवास करने वाले पंडितों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। फिर ये सम्पन्नता किस काम की?
पूजा के बाद प्रसाद वितरण के दौरान शोरशराबे ने भी व्यवस्था को नया आयाम देने के संकल्प को और अधिक मजबूत किया। भगवती मंडप के सौंदर्य को दर्शनीय और अलौकिक बनाने की भी सोच थी।
इस सोच को साकार करने के लिए पर्याप्त मात्रा में धन की आवश्यकता थी। परिवार की संपन्नता से मैं अवगत था। मैंने धन संग्रह करने के लिए एक स्मारिका प्रकाशित करने का प्रस्ताव रखा। इस स्मारिका में परिवार के सदस्यों को डेढ़ लाख से एक हजार रुपए देने के विकल्प दिये गए। स्मारिका की सोच की तात्कालिक वजह तो धन संग्रह था लेकिन दीर्घकालिक वजह बाईस खूट परिवार का इतिहास, खूट का विवरण, परिवार की वंशावली तैयार करना था। ताकि अतीत को संजोया जा सके और भविष्य को एक लिखित दस्तावेज उपलब्ध कराया जा सके।
स्मारिका का प्रकाशन एक वर्ष की अवधि में करने की मैंने बात कही थी। हमारे पूर्वजों और अग्रजों ने विशाल और भव्य भगवती मंडप वर्षों के संघर्ष, सहयोग और समर्पण से तैयार किया था। सौंदर्य को बढ़ाना मेरा लक्ष्य था।
परिवार से जिस प्रकार का आर्थिक सहयोग आया उसकी कल्पना मुझे भी नहीं थी। आर्थिक सहयोग बढ़ता गया। भगवती मंडप का सौंदर्य बढ़ता गया। देश भर में ख्याति प्राप्त मूर्तिकार और मेरे बाल सखा श्याम विश्वकर्मा ने अपनी कला कृतियों और कला की बारीकियों से मंडप के सौंदर्य को अलौकिक बना दिया। मंडप के अंदर और बरामदे के पूरे दीवार पर टाइल्स लगा। पूरे मंडप के बिजली के तारों का अंडर वायरिंग, मंडप के सभी गेट, खिड़कियां स्टील के लगाये गए। ध्वनि यंत्र का विस्तार किया गया। रोशनी की व्यवस्था को नए सिरे से नया रूप दिया गया। पंडितों के आवासन के लिए सामुदायिक भवन में बाथ रूम की व्यवस्था बाईस खूट परिवार के सदस्य और मोतिया के मुखिया माननीय अशोक चौधरी द्वारा किया गया। पंडितों के लिए बेहतर आवासन के लिए हर सुविधा उपलब्ध कराई गई। बाईस खूट परिवार के स्वर्गीय गौरी चौधरी की पत्नी मंजू चाची ने मंडप के बगल की अपनी जमीन भगवती मंडप को दान कर दी है। उस जमीन पर पंडितों के आवासन के लिए एक बड़ा हॉल अन्य सुविधाओं के साथ तैयार किया जा रहा है। जो वर्ष 2027 तक बन कर तैयार हो जायेगा।
उपरोक्त कार्यों में सक्रियता के कारण स्मारिका के प्रकाशन के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था। हालांकि स्मारिका के लिए बाईस खूट परिवार के सभी खूंटों की वंशावली तैयार करने का जिम्मा परिवार के श्री माधव चंद्र चौधरी उर्फ माधो चाचा और श्री अवधेश चौधरी उर्फ बाबूल भैया ने ले रखा था। दोनों के कठिन परिश्रम और अथक प्रयास से वंशावली, परिवार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पूजा पद्धति सहित अन्य जानकारियों का संकलन किया गया।
स्मारिका प्रकाशन मेरी सोच में था लेकिन माधो चाचा द्वारा इसी दौरान एक पुस्तक लिखी गई। जिसमें कुछ वंशावली भी डाली गई थी। उस वंशावली में कुछ त्रुटियों की बात सामने आई। इस जानकारी के बाद मैंने स्मारिका की जगह वेब साइट बनाने का निर्णय लिया। वेब साइट में यदि कोई त्रुटि रह गई तो तुरंत सुधार संभव है। आज के डिजिटल युग में वेब साइट परिवार के सभी सदस्यों के लिए ज्यादा लाभकारी भी होगा। वेब साइट में नई जानकारियां तत्काल जोड़ी जा सकती हैं। गलतियों को सुधारा जा सकता है। नए-नए विकल्प और आयाम जोड़े जा सकते हैं।
वेब साइट में परिवार के पुत्रों के अगले वंश को आगे बढ़ाया गया है। बेटियों के पति का नाम और उनकी शादी कहां हुई उसका उल्लेख है। जिनको सिर्फ पुत्री है उनके पुत्रियों के आगे के वंश के उल्लेख करने की सोच है।
परिवार की सहमति, सोच और विमर्श के अनुसार वेब साइट के आयामों को नई दिशा देने का विकल्प खुला है। वेब साइट में ऐसी व्यवस्था रखी गई है कि यदि कोई पूरे बाईस खूट का विवरण देखना चाहे तो देख सकते हैं। सिर्फ अपने खूट का विवरण देखना चाहे तो वो भी संबंधित खूट का विवरण देख सकते हैं। हर प्रकार का विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है। यदि कोई पूरा या संबंधित अंश का पीडीएफ बनाना चाहे या प्रिंट आउट निकालना चाहें तो निकाल सकते हैं। वेब साइट में ऑडियो-वीडियो का भी प्रावधान है। इसमें मां भगवती और बाईस खूट परिवार से संबंधित वीडियो और ऑडियो उपलब्ध रहेगा। भविष्य में यह प्रावधान भी किया जा सकता है कि बाईस खूट परिवार के सदस्य अपने यहां की शादी, उपनयन इत्यादि का वीडियो भुगतान कर अपलोड करवा सकते हैं, निमंत्रण कार्ड सबको भेज सकते हैं। सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है। सुधार जारी रहेगा जब तक सहयोग का क्रम जारी रहेगा।
वेब साइट निर्माण, माँ भगवती के ऑडियो-वीडियो बनाने में दोनों पुत्र - निलेश, अन्वेष के सहयोग की प्रशंसा करता हूं।
भगवती मंडप के सौंदर्यीकरण, निर्माण कार्य, आर्थिक प्रबंधन और संचालन की व्यवस्था में अतुलनीय योगदान और मार्गदर्शन के लिए मैं हृदय की गहराईयों से लल्लू भैया, प्रफुल्ल भैया, कैलू भैया, मिथलेश (बुच्चू) चाचा, डिंपल, गुड्डू, अमरेश, नरोत्तम और शिवम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं।
हर मोड़ पर हौसला बढ़ाने और रचनात्मक सलाह देते रहने के लिए मैं भवानंद चाचा, डॉक्टर सुभाष भैया, डॉक्टर रंजन भैया, शशि भैया, डॉक्टर अभय प्रकाश भैया, विधान भैया, के साथ नीरज भाई जी के प्रति आभारी हूं। सहयोग, मार्गदर्शन और आशीर्वाद का आकांक्षी।
स्वर्गीय प्राणधन चौधरी